अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम और Planetary Boundaries Science Lab की तरफ से जारी की गई प्लैनेटरी हेल्थ चेक रिपोर्ट ने पूरी दुनिया के लिए रेड अलर्ट लगा दिया है. स्टडी के मुताबिक इंसानों के अस्तित्व को सुरक्षित रखने वाली धरती की 9 मेन सुरक्षा लेयर्स हैं. गौरतलब ये है कि इनमें से 7 लेयर को इंसानों ने अपनी गतिविधियों से पार कर लिया है. पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इंपैक्ट रिसर्च (PIK) और दुनिया के टॉप साइंटिस्ट्स की इस जॉइंट रिपोर्ट में वॉर्निंग दी गई है कि धरती के सिस्टम के बफर यानी झटके सहन करने की क्षमता अब धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं, जिससे ग्लोबल क्लाइमेट और इकोसिस्टम के ढहने का खतरा बढ़ गया है.
‘प्लैनेटरी बाउंड्री’ क्या है?
वैज्ञानिकों ने धरती के पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए 9 ऐसी सिक्योरिटी लिमिट तय की हैं, जिनके अंदर रहने पर ही इंसानी सभ्यता फल-फूल सकती है. इन्हें सेफ ऑपरेटिंग स्पेस कहा जाता है. अगर इंसानों के काम और उनकी गतिविधियां इन सीमाओं को पार करती हैं, तो जलवायु, मौसम, महासागर और जंगलों में ऐसे बदलाव शुरू हो जाते हैं जिन्हें कभी भी ठीक नहीं किया जा सकता है.
वैज्ञानिकों ने धरती के पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए 9 ऐसी सिक्योरिटी लिमिट तय की हैं, जिनके अंदर रहने पर ही इंसानी सभ्यता फल-फूल सकती है. इन्हें सेफ ऑपरेटिंग स्पेस कहा जाता है. अगर इंसानों के काम और उनकी गतिविधियां इन सीमाओं को पार करती हैं, तो जलवायु, मौसम, महासागर और जंगलों में ऐसे बदलाव शुरू हो जाते हैं जिन्हें कभी भी ठीक नहीं किया जा सकता है.
वो 7 कौन सी सीमाएं हैं जिन्हें इंसानों ने पार कर लिया है?
वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार टोटल 9 में से 7 सीमाएं अब सेफ जोन से बाहर निकलकर खतरे के निशान को पार कर चुकी हैं. इसमें क्या खतरा है और अभी की स्थिति क्या है, आइए समझते हैं.
- जलवायु परिवर्तन: जीवाश्म ईंधन यानी कोयला, तेल, गैस के अत्यधिक जलने से वायुमंडल में कार्बन डाई ऑक्साइड का लेवल 426 PPM पार कर चुका है, जो औद्योगिक क्रांति से पहले 280 PPM था.
- बायोडायवर्सिटी का नुकसान: प्रजातियों के विलुप्त होने की दर सुरक्षित सीमा से कई गुना तेज हो गई है.
- जमीन के सिस्टम में चेंज: अमेजन सहित बड़े जंगलों की कटाई और खेती की जमीन के विस्तार से प्राकृतिक तौर पर सोखने की क्षमता खत्म हो रही है.
- फ्रेशवाटर का संकट: नदियों, झीलों और ग्राउंडवाटर का अंधाधुंध दोहन और उनका प्रदूषण हो रहा है.
- बायो-जियोकेमिकल का फ्लो: खेती में नाइट्रोजन का इस्तेमाल सुरक्षित सीमा से 2 गुना और फास्फोरस का यूज लगभग 3 गुना अधिक हो रहा है.
- आर्टिफिशियल केमिकल और प्रदूषण: प्लास्टिक, कीटनाशक और फॉरएवर केमिकल्स (PFAS) मिट्टी, हवा और पानी में जहरीला असर डाल रहे हैं.
- समुद्र का एसिड: समुद्रों का लगातार एसिडिक होना शामिल है. यह सीमा सबसे हाल ही में सुरक्षित दायरा पार कर खतरे के निशान में पहुंची है.
समुद्रों का एसिडिफिकेशन
रिपोर्ट में सबसे चिंताजनक बात यह सामने आई है कि समुद्रों का एसिडिफिकेशन भी अब खतरे के जोन में चला गया है.
रिपोर्ट में सबसे चिंताजनक बात यह सामने आई है कि समुद्रों का एसिडिफिकेशन भी अब खतरे के जोन में चला गया है.
- 30 फीसदी कार्बन सोख चुके हैं समुद्र: पिछले एक दशक में इंसानों की तरफ से उत्सर्जित कार्बन डाई ऑक्साइड का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा महासागरों ने सोख लिया है.
- एसिडिटी में 30-40 फीसदी की बढ़ोत्तरी: औद्योगिक काल की शुरुआत से अब तक समुद्री सतह का pH लेवल 0.1 यूनिट तक गिर चुका है, जिसका मतलब है कि समुद्र का पानी 30 से 40 प्रतिशत तक अधिक ऐसिडिक हो चुका है.
- जलीय जीवन पर असर: जरूरत से अधिक एसिड की वजह से कोरल रीफ्स और सीप-घोंघे जैसे जीवों के शेल्स गल रहे हैं, जिससे पूरे समुद्री फूड चेन के तबाह होने का खतरा पैदा हो गया है.
कौन सी 2 सीमाएं अभी भी सेफ जोन में हैं?
वैज्ञानिकों के अनुसार केवल दो सीमाएं ही फिलहाल सुरक्षित दायरे के अंदर बनी हुई हैं. 9 में से 7 का जिक्र ऊपर हो चुका है और बाकी की दो बची हुई नीचे हैं. सुविधा के लिए 8 और 9 नंबर लिखा गया है.
वैज्ञानिकों के अनुसार केवल दो सीमाएं ही फिलहाल सुरक्षित दायरे के अंदर बनी हुई हैं. 9 में से 7 का जिक्र ऊपर हो चुका है और बाकी की दो बची हुई नीचे हैं. सुविधा के लिए 8 और 9 नंबर लिखा गया है.
- 8. ओजोन लेयर का नुकसान: मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल और अंतरराष्ट्रीय नियमों की वजह से ओजोन लेयर में सुधार देखा गया है.
- 9. वायुमंडल में एरोसोल: ग्लोबल लेवल पर वायुमंडल के पार्टिकल्स का लेवल सुरक्षित माना गया है, हालांकि कई घने इंडस्ट्रियल इलाकों में यह लोकल स्तर पर खतरनाक बना हुआ है.
अमेजन के जंगल और कार्बन सिंक का कमजोर पड़ना
रिपोर्ट में शामिल वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि हमारी धरती के कार्बन सिंक जैसे जंगल और महासागर अब और अधिक कार्बन सोखने की स्थिति में नहीं हैं. अमेजन के रेन फॉरेस्ट अपने टिपिंग पॉइंट के करीब हैं. थोड़ी सी और जंगल की कटाई इस क्षेत्र के दो-तिहाई हिस्से को सूखा सकती है, जिससे जो जंगल कार्बन सोखते थे, वही भारी मात्रा में CO2 हवा में छोड़ने लगेंगे.
रिपोर्ट में शामिल वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि हमारी धरती के कार्बन सिंक जैसे जंगल और महासागर अब और अधिक कार्बन सोखने की स्थिति में नहीं हैं. अमेजन के रेन फॉरेस्ट अपने टिपिंग पॉइंट के करीब हैं. थोड़ी सी और जंगल की कटाई इस क्षेत्र के दो-तिहाई हिस्से को सूखा सकती है, जिससे जो जंगल कार्बन सोखते थे, वही भारी मात्रा में CO2 हवा में छोड़ने लगेंगे.
क्या सुधार की उम्मीद अभी बाकी है?
पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर जोहान रॉकस्ट्रॉम का कहना है कि धरती का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा है, लेकिन यह कोई अंत नहीं है. ओजोन परत का ठीक होना यह साबित करता है कि अगर इंसान सही कदम उठाए तो धरती का कन्जर्वेशन संभव है.
पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर जोहान रॉकस्ट्रॉम का कहना है कि धरती का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा है, लेकिन यह कोई अंत नहीं है. ओजोन परत का ठीक होना यह साबित करता है कि अगर इंसान सही कदम उठाए तो धरती का कन्जर्वेशन संभव है.
वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि अगर हमने तुरंत जीवाश्म ईंधन के उपयोग को सीमित नहीं किया, जंगलों की कटाई नहीं रोकी और खेती के तरीकों में बदलाव नहीं लाया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए धरती पर जीवन का पूरा स्ट्रक्चर ही ढह जाएगा.




