कोरबा। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के करतला वन परिक्षेत्र से इंसान और वन्यजीवों के बीच प्रेम और सह-अस्तित्व की अनूठी तस्वीर सामने आई है। जंगल में नौ हाथियों के झुंड के बीच जन्मे नन्हे हाथी के स्वागत में सात गांवों के ग्रामीण एकजुट हुए। रविवार को ग्रामीणों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ नन्हे हाथी की छठी मनाई और उसे प्यार से ‘काशी’ नाम दिया। इस आयोजन में भजन-कीर्तन, पूजा-अर्चना और सामूहिक भोज का आयोजन किया गया।
सात गांवों के ग्रामीण हुए एकजुट
नन्हे हाथी की छठी का आयोजन काशीपानी जंगल स्थित कारीपानी मंदिर के नीचे गौठान टिकरापारा में किया गया। इसमें रामभाठा, लबेद, पाहराभांठा, काशीपानी, छातापाठ, जामपानी और छुईडुंगा गांव के ग्रामीण बड़ी संख्या में शामिल हुए।
मंदिर परिसर में पारंपरिक तरीके से पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद भजन-कीर्तन हुआ और ग्रामीणों के लिए सामूहिक भोजन की व्यवस्था की गई। ग्रामीणों की इस पहल ने क्षेत्र में लोगों और वन्यजीवों के बीच भावनात्मक जुड़ाव को चर्चा में ला दिया है।
धिनारा गांव से शुरू हुई नन्हे हाथी की छठी मनाने की परंपरा
स्थानीय लोगों के मुताबिक, नन्हे हाथी की छठी मनाने की परंपरा की शुरुआत धिनारा गांव से हुई थी। धीरे-धीरे आसपास के गांवों के लोग भी इससे जुड़ने लगे। अब ग्रामीण हाथियों को जंगल का अहम हिस्सा मानते हुए उनके प्रति अपनापन और संवेदनशीलता दिखा रहे हैं।
यह आयोजन वन्यजीवों के साथ सह-अस्तित्व की भावना को बढ़ावा देने वाली पहल के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, हाथियों की मौजूदगी के बीच ग्रामीणों के लिए सतर्कता बरतना भी जरूरी है।
कोरबा जिले में 48 हाथियों की मौजूदगी
वन विभाग के अनुसार, करतला रेंज के काशीपानी जंगल में नौ हाथियों का झुंड विचरण कर रहा है। इसके अलावा कुदमुरा रेंज में 32 और चचिया क्षेत्र में सात हाथियों की मौजूदगी बताई गई है। इस तरह जिले में कुल 48 हाथी अलग-अलग इलाकों में घूम रहे हैं।
हाल के दिनों में हाथियों ने 17 किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचाया है। इससे ग्रामीणों की चिंता बढ़ी है। वन विभाग हाथियों की गतिविधियों पर नजर रख रहा है और लोगों से सतर्क रहने की अपील कर रहा है।
दो दशक से हाथियों की आवाजाही का क्षेत्र है यह जंगल
स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, इस क्षेत्र के जंगलों में करीब 20 वर्षों से हाथियों का आना-जाना लगा हुआ है। हाथियों के झुंड यहां कुछ समय तक ठहरने के बाद दूसरे इलाकों की ओर चले जाते हैं। इस क्षेत्र को हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्ग यानी कॉरिडोर का हिस्सा माना जाता है।
बताया जाता है कि वर्ष 2000 में पहली बार कुदमुरा रेंज के आमटिकरा गांव में हाथियों की मौजूदगी दर्ज की गई थी। इसके बाद जिले में हाथियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती गई। एक समय कोरबा जिले में हाथियों की संख्या करीब 150 तक पहुंचने की बात भी सामने आई थी।
वन विभाग की अपील—हाथियों से बनाए रखें सुरक्षित दूरी
वन विभाग के एसडीओ मणिकांत वर्मा ने ग्रामीणों से हाथियों के नजदीक नहीं जाने और उन्हें परेशान नहीं करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि हाथियों की गतिविधियों के दौरान सुरक्षित दूरी बनाए रखना जरूरी है।
उन्होंने यह भी बताया कि हाथियों के कारण फसलों को हुए नुकसान के मामलों में नियमानुसार मुआवजा दिया जाता है। जनहानि रोकने के लिए ग्रामीणों को सतर्क रहना चाहिए और हाथियों की आवाजाही की जानकारी वन विभाग को देनी चाहिए।
‘काशी’ की छठी बनी चर्चा का विषय
नन्हे हाथी की छठी में सात गांवों के ग्रामीणों की भागीदारी ने यह संदेश दिया कि जंगल और वन्यजीव स्थानीय जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। एक ओर हाथियों से फसलों को नुकसान पहुंचने जैसी चुनौतियां हैं, तो दूसरी ओर ग्रामीणों की यह पहल इंसान और प्रकृति के बीच बेहतर तालमेल की उम्मीद भी जगाती है।




