बस्तर, 15 अगस्त —
देश आज अपनी स्वतंत्रता की 78वीं वर्षगांठ मना रहा है। चारों ओर देशभक्ति की लहर है, तिरंगे की शान के साथ-साथ उन वीरों के बलिदानों की गूंज भी सुनाई दे रही है जिन्होंने इस स्वतंत्रता को अपने प्राणों की आहुति देकर संभव बनाया। आज जब देश जश्न मना रहा है, ऐसे समय में बस्तर अंचल के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को याद करना अत्यंत आवश्यक है, जो अंग्रेजों के खिलाफ स्थानीय संघर्षों और बलिदानों की गाथा से भरा पड़ा है।
गेंदसिंह से शुरू हुई बस्तर की चिंगारी
बस्तर की धरती पर स्वतंत्रता की चिंगारी सबसे पहले 1825 में परलकोट के जमींदार गेंदसिंह ने भड़काई थी। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजों के दमनकारी शासन के विरुद्ध मोर्चा खोला। यह आंदोलन पांच वर्षों तक चला और अंततः 20 जनवरी 1825 को गेंदसिंह को परलकोट महल के सामने फाँसी दे दी गई। आज उन्हें “शहीद गेंदसिंह” के नाम से स्मरण किया जाता है।
रानी सुवर्ण कुमारी और लाल कालेन्द्र का नेतृत्व
इसके बाद स्वतंत्रता की आग बस्तर की रियासत तक पहुँच चुकी थी। महारानी सुवर्ण कुमारी और उनके सहयोगी लाल कालेन्द्र सिंह ने ब्रिटिश हुकूमत की नीतियों का खुलकर विरोध किया। रानी ने तोड़ोकी ग्रा
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