Thursday, January 1, 2026

हमें अपने कर्मों के लिए फल की चिंता नहीं करनी चाहिए – डॉ स्वामी युगल शरण जी

कंचन की नगरी चांपा के हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रहे आनंद ही जीवन का लक्ष्य को लेकर वृंदावन से आएं डॉ स्वामी युगल शरण ने कहा कि कर्म मार्ग एक ऐसा मार्ग हैं जिसमें हम अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में बदलने के लिए कर्म करते हैं । कर्म मार्ग में हमें अपने कर्तव्यों का सदैव पालन करना होता हैं और हमें अपने कर्मों के फल की चिंता नहीं करनी चाहिए । डॉ स्वामी जी महाराज ने कर्म योग के बारे में विस्तृत व्याख्या करते हुए कर्म के चार प्रकार बताए हैं ।

कर्म -कर्म में चार चीजें आती हैं , नित्य कर्म , नैमित्तिक कर्म, काम्या कर्म और प्रायश्चित कर्म ।

विकर्म – विकर्म उसको कहते हैं जो न तो श्रुति स्मृति युक्त कर्म-धर्म का पालन करता हैं और न ही भगवान की भक्ति करता हैं ।

अकर्म या कर्मयोग – कर्मयोगी वो होता हैं जो शरीर से कर्म करता हैं, मन से भगवान का भक्ति करता हैं ।

कर्म संन्यास – कर्म संन्यासी वर्णाश्रम धर्म, सात्त्विक धर्म का पूर्णतः त्याग कर देता हैं और केवल मन से भक्ति करता हैं ।

सैकड़ों के बैठने की व्यवस्था

प्रिंट मीडिया तथा सीजी टाईम्स पोर्टल न्यूज के लेखक शशिभूषण सोनी ने बताया कि अद्वितीय समन्वयात्मक विलक्षण, धारावाहिक प्रवचन सुनने के लिए विशाल पंडाल बनाया गया हैं । इस स्थान पर हजारों की संख्या में एक साथ बैठकर प्रवचन सुन सकते हैं । प्रेस क्लब चांपा अध्यक्ष डॉ कुलवंत सिंह सलूजा की पुत्रवधू , शशिभूषण सोनी , रमेश सोनी, आशीष अग्रवाल कथा श्रवण करने पहुंचे ।

कर्म और भक्ति की व्याख्या

सुप्रसिद्ध दार्शनिक डॉ युगल महराज ने कहा कि कर्म और भक्ति दोनों ही महत्वपूर्ण हैं । कर्म करने से हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना होता हैं और भक्ति करने से हमें भगवान की प्राप्ति होती हैं । कर्म योगी जो भी कर्म करते हैं, वह शरीर से यथा शक्ति कर्म करता हैं और मन से भगवान की भक्ति करता हैं ।

सार तत्व ! कर्म और भक्ति दोनों ही जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता हैं

कर्म मार्ग एक ऐसा मार्ग हैं जिसमें हम अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में बदलने के लिए कर्म करते हैं । कर्म और भक्ति दोनों ही महत्वपूर्ण हैं । हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना होता हैं और भगवान की भक्ति करनी होती हैं ।

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