कोरबा के रजगामार में 7 साल की बच्ची के साथ जो हुआ, उसे पढ़ कर रूह कांप जाती है। राशन दुकान तक गई एक मासूम, जो घर लौट कर अपनी माँ को सामान थमाने वाली थी, तीन दिन बाद झाड़ियों में मिली। और हम क्या कर रहे हैं? एक गिरफ्तारी पर तालियाँ बजा रहे हैं।
नहीं, यह सफलता नहीं है।
पुलिस ने आरोपी को पकड़ लिया, खोजी कुत्ते बाघा ने अपना काम कर दिया। लेकिन क्या यही न्याय है? गिरफ्तारी तो प्रक्रिया का पहला कदम है, आखिरी नहीं। असली परीक्षा अब शुरू होती है – क्या यह केस फास्ट ट्रैक में टिकेगा? क्या FSL रिपोर्ट समय पर आएगी? क्या चार्जशीट में POCSO की मजबूत धाराएं जोड़ी जाएंगी? क्या सरकारी वकील महीने भर बाद भी उतनी ही मजबूती से पैरवी करेगा, जितनी आज पुलिस जुलूस निकाल रही है? अगर इन सवालों के जवाब नहीं, तो यह गिरफ्तारी सिर्फ एक फोटो-ऑप है।
और महिला उत्पीड़न पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाली संस्थाएं कहाँ हैं?
सोशल मीडिया पर हैशटैग चलाने वाली, सेमिनार में महिला सशक्तिकरण के पोस्टर लगाने वाली, सरकारी अनुदान पर रिपोर्ट छापने वाली संस्थाओं की यह खामोशी सबसे ज्यादा चुभती है।
जब एक मजदूर परिवार की, सक्ती से पलायन कर कोरबा आई 7 साल की बच्ची मारी जाती है, तो आपका मौन क्या बताता है? क्या न्याय सिर्फ शहर की, अंग्रेजी बोलने वाली, कैमरे वाली बेटियों के लिए है? क्या रजगामार की बेटी आपके एजेंडे में फिट नहीं बैठती इसलिए आप चुप हैं?
आपकी यह चयनात्मक चुप्पी अपराधी से भी बड़ा अपराध है। आप पीड़िता के साथ नहीं, व्यवस्था के साथ खड़ी हैं।
आम जनता से एक अपील – इस आग को बुझने मत दो
रजगामार चौकी के सामने जो भीड़ जुटी, वो गुस्सा जायज था। पर भीड़ दो दिन में घर चली जाएगी। अपराधी को यही चाहिए।
इसलिए मेरी आप सभी से हाथ जोड़ कर अपील है:
1. गिरफ्तारी को जीत मत मानो। जीत तब होगी जब फास्ट ट्रैक कोर्ट में 60 दिन में सजा होगी। तब तक हर पेशी पर नजर रखनी है। हर सुनवाई की जानकारी सार्वजनिक करवानी है।
2. मुहिम को मोहल्ले तक ले जाओ। अपने बच्चों को बताओ, अपने पड़ोस में चौकीदारी बढ़ाओ। हर राशन दुकान, हर पोल्ट्री फार्म मालिक की जिम्मेदारी तय करो। मजदूर परिवारों की बस्तियों में सुरक्षा सबसे कम क्यों है?
3. मौन संस्थाओं से सवाल पूछो। उनसे पूछो कि आप रजगामार क्यों नहीं आए? उनके कार्यालय के बाहर जाकर पूछो। जब तक वे जवाब नहीं देतीं, उनका बहिष्कार करो।
रजगामार की बेटी अब वापस नहीं आएगी। लेकिन हम तय कर सकते हैं कि उसकी मौत सिर्फ एक खबर बन कर न रह जाए।
यह लड़ाई एक आरोपी के खिलाफ नहीं, उस सोच के खिलाफ है जो 7 साल की बच्ची को भी शिकार समझती है, और उस सिस्टम के खिलाफ है जो गिरफ्तारी को ही न्याय समझ कर फाइल बंद कर देता है।
जब तक अंतिम सजा नहीं, तब तक कोई जश्न नहीं। तब तक मुहिम जारी रहेगी।




