रायपुर, 02 नवंबर 2026/छत्तीसगढ़ के 26वें स्थापना दिवस पर नवा रायपुर स्थित राज्योत्सव स्थल में वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की प्रदर्शनी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। यहां जंगल और वन्यजीवों के संरक्षण के साथ आदिवासी संस्कृति, ग्रामीण आजीविका और आत्मनिर्भरता की पहल एक साथ देखने को मिल रही हैं। आज राजधानी रायपुर में राज्योत्सव के दूसरे दिन वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप ने विभागीय स्टॉल का निरीक्षण भी किया। इस दौरान मंत्री श्री कश्यप ने वनोपजों से बने उत्पादों को चखा और उत्पादन. प्रसंस्करण को लेकर वन धन विकास केन्द्र के समिति सदस्यों से जानकारी ली।
गौरतलब है कि राजधानी रायपुर में राज्योत्सव स्थल पर अनेक विभागों की प्रदर्शनी लगाई गई है। इसमें वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की योजनाओं और विभागीय जानकारी प्रदान करने प्रदर्शनी भी है। इसमें विभागीय प्रदर्शनी का मुख्य द्वार इंद्रावती टाइगर रिजर्व, बीजापुर के प्रसिद्ध चेंदरू द्वार की तर्ज पर बनाया गया है। इसमें बस्तर के आदिवासी युवक चेंदरू और बाघ की मित्रता को दर्शाया गया है, जो मानव और वन्यजीव के सह-अस्तित्व का प्रतीक है। सोमवार 2 नवंबर को विभागीय मंत्री श्री केदार कश्यप प्रदर्शनी निरीक्षण के लिए पहुँचे। मंत्री श्री कश्यप ने वनोपजों से बनी औषधियों के बारे में समिति और विभागीय अधिकारियों से जानकारी ली। इस दौरान लहसुन व अन्य वनोपज से बनी दवाओं के औषधीय गुणों के बारे में जानकारी ली। उन्होंने कोदो से बने बिस्कुट का स्वाद चखा और इसकी सराहना की। मंत्री श्री कश्यप ने कभी नक्सलवाद से जुड़ी रहने वाली आत्मसमर्पित महिलाएँ जो अब वन धन विकास केन्द्रों से जुड़कर मुख्यधारा में काम कर रही हैं, उनसे चर्चा की।
राज्योत्सव के दौरान वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की ओर से ‘संवरता छत्तीसगढ़’ थीम के अंतर्गत ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान की उपलब्धियां प्रदर्शित की गई हैं। विभाग के अनुसार वर्ष 2024 में 3.50 करोड़ और वर्ष 2025 में 3.55 करोड़ पौधे रोपे गए। किसान वृक्ष मित्र योजना के तहत 36,896 किसानों ने अपनी 62,441 एकड़ निजी भूमि पर 3.67 करोड़ पौधे लगाए हैं। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ किसानों की आय बढ़ाने के अवसर भी बने हैं।
‘बदलता बस्तर’ पैनल में क्षेत्र में आए बदलाव और आजीविका संवर्धन के प्रयासों को दर्शाया गया है। इसके तहत 572 देवगुड़ियों का निर्माण एवं जीर्णाेद्धार किया गया है। मनरेगा के माध्यम से 21.67 लाख मानव दिवस का रोजगार सृजित हुआ है। वनोपज संग्रहण से ग्रामीणों को सीधा लाभ मिल रहा है। कांगेर वैली क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए 35 जिप्सियों का संचालन किया जा रहा है, जिससे लगभग 200 स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला है। संयुक्त वन प्रबंधन एवं रोजगार स्टॉल पर बांस से बने घर, नाव, मछली, लालटेन, मंदिर, फूलदान और सजावटी उत्पाद प्रदर्शित किए गए हैं। ये उत्पाद ग्रामीण कारीगरों की कला और कौशल को सामने लाते हैं। वन धन केंद्रों में तैयार शहद, आंवला और अन्य उत्पाद भी बिक्री के लिए उपलब्ध हैं।
औषधीय पादप बोर्ड की ‘घर की बाड़ी में औषधीय पौधों का रोपण’ योजना के जरिए ग्रामीण महिलाओं को आय के अवसरों से जोड़ने की जानकारी दी जा रही है। बोर्ड के अनुसार बाड़ी में सिंगी और सतावर जैसे पौधे लगाकर महिलाएं सालाना 20 से 30 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर सकती हैं और इसका लाभ 20 वर्षों तक मिल सकता है। धमतरी जिले के 27 गांवों में पायलट परियोजना के तहत 1.21 लाख पौधे लगाए गए हैं। छत्तीसगढ़ हर्बल्स स्टॉल पर सफेद मूसली चूर्ण, त्रिफला चूर्ण, आंवलकी चूर्ण, एलोवेरा शैम्पू, महाभृंगराज तेल और एलोवेरा साबुन जैसे उत्पाद प्रदर्शित हैं। कांगेर घाटी, तीरथगढ़ जलप्रपात और ग्रामीण तालाब के मॉडल भी दर्शकों का ध्यान खींच रहे हैं और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहे हैं।
प्रदर्शनी देखने पहुंचे ग्राम मरोद के श्री त्रिवेंद्र साहू और श्री रवि निर्मलकर ने कहा कि वन विभाग की प्रदर्शनी देखकर लगा, जैसे पूरे छत्तीसगढ़ के जंगल की खूबियां एक ही जगह सिमट आयी हो। बांस की कलाकृतियां, औषधीय पौधों की जानकारी और हर्बल उत्पाद बहुत उपयोगी हैं। उन्होंने जंगलों के संरक्षण के साथ ग्रामीणों को रोजगार से जोड़ने की पहल को सराहनीय बताया।
क्रमांक: 10581/राठौर/सोन
समाचार
इंद्रावती के कछार से सहकारिता के शीर्ष तक
बस्तर के धनसिंह बघेल को मिलेगा प्रतिष्ठित ‘ठाकुर प्यारेलाल सिंह पुरस्कार’
रायपुर, 02 नवंबर 2026/छत्तीसगढ़ शासन द्वारा सहकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय और प्रेरणादायक कार्य करने वाले विभूतियों को सम्मानित किए जाने की परंपरा के तहत इस वर्ष बस्तर अंचल से एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। राज्य शासन ने जगदलपुर के चित्रकोट स्थित प्राथमिक कुडुक मछुआ एवं नौका विहार सहकारी समिति मर्यादित के अध्यक्ष श्री धनसिंह बघेल को राज्य के प्रतिष्ठित ‘ठाकुर प्यारेलाल सिंह पुरस्कार’ से सम्मानित किए जाने की घोषणा की है।
शून्य से शिखर तक का सफर- पारंपरिक आजीविका से सहकारिता की मिसाल
इंद्रावती नदी के तट पर बसे इस वनांचल अंचल में कभी ग्रामीण पारंपरिक रूप से मछली पकड़ने, वनोपज संग्रहण और सीमित कृषि पर ही आश्रित हुआ करते थे। मत्स्य पालन विभाग के मार्गदर्शन में वर्ष 2009 में मात्र 42 सदस्यों को संगठित कर श्री धनसिंह बघेल ने इस समिति की नींव रखी थी। शुरुआती संघर्षों के बाद इस समिति ने वर्ष 2014 से चित्रकोट सिंचाई जलाशय और ग्राम पंचायत के रावन मुंडा को पट्टे पर लेकर मत्स्य पालन की दिशा में एक नया अध्याय शुरू किया। प्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात के पर्यटन महत्व को पहचानते हुए समिति ने सहकारिता विभाग के सहयोग से इसमें श्नौका विहारश् (बोटिंग) को भी जोड़ा, जो आज इनकी सफलता का सबसे बड़ा आधार बन गया है।
स्वावलंबन और आर्थिक तरक्की की कहानी
वर्तमान में 62 सदस्यों (जिसमें 41 पुरुष और 21 महिलाएं शामिल हैं) की सहभागिता वाली यह समिति आज बस्तर में स्वावलंबन का एक सशक्त केंद्र बन चुकी है। जलाशय और नदी से प्रतिवर्ष क्रमशः 1,980 और 3,600 किलोग्राम मछली का उत्पादन किया जा रहा है, जिससे लगभग साढ़े 9 लाख रुपये की आय हो रही है। पर्यटकों को नौका विहार की सुविधा उपलब्ध कराकर सालाना लगभग 8 लाख रुपये की अतिरिक्त आमदनी हो रही है। समिति का औसत वार्षिक शुद्ध लाभ अब 10 लाख रुपये तक पहुँच चुका है, जिसमें अकेले वित्त वर्ष 2024-25 में ही 8,32,985 रुपये का शानदार शुद्ध लाभ दर्ज किया गया।
आत्मनिर्भरता की नई मिसाल और जीवनस्तर में सुधार
वर्तमान में इस समिति के पास सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम के रूप में 250 लाइफ जैकेट, 7 नावें और आधुनिक उपकरण मौजूद हैं। शासन की शुरुआती योजनाओं और अनुदानों से संबल मिलने के बाद अब यह समिति पूरी तरह आत्मनिर्भर हो चुकी है। अपनी मेहनत और वित्तीय मजबूती के दम पर समिति ने खुद के खर्चे से मछली अवतरण के लिए लैंडिंग सेंटर का निर्माण कराया है और परिवहन के लिए पिकअप वाहन भी खरीदा है।
इस सहकारिता मॉडल ने बस्तर के 62 परिवारों के जीवनस्तर में क्रांतिकारी बदलाव लाया है। आज इन परिवारों के सदस्य अपनी मेहनत के बल पर मोटरसाइकिल जैसी सुविधाएं जुटाने के साथ-साथ अपने बच्चों को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने में पूरी तरह सक्षम हो रहे हैं। श्री धनसिंह बघेल के कुशल नेतृत्व और दूरदर्शिता ने यह साबित कर दिया है कि स्थानीय संसाधनों, सहकारिता की शक्ति और पर्यटन के सुनियोजित मेल से वनांचल के लोगों की तकदीर और तस्वीर दोनों बदली जा सकती हैं। उनकी इस उपलब्धि पर पूरे बस्तर अंचल में हर्ष का माहौल है।




