संतों लगा हैं कुंभ का मेला, एक हिलोर इधर से आई।
एक हिलोर उधर से आई, फंसा भंवर में बीच चेला।
सब सखियन मिल सोहर गावै , जन्मा राम गदेला ।।
जय-जयकार भाई त्रिभुवन में, साहेब खड़ा अकेला।
संतों लगा हैं कुंभ का मेला ।। ( कवि हजारी प्रसाद द्विवेदी की कविता )
न्यूज़ जांजगीर-चांपा । प्रयागराज सभी तीर्थों में श्रेष्ठ माना जाता हैं । जिसका वर्णन ब्रह्मपुराण में प्राप्त होता हैं , ‘प्रकृष्टत्वा प्रयागों सौ प्राधान्या राज शब्द वान्’ अपने प्रकृष्टत्य , अर्थात उत्कृष्टता के कारण यह प्रयाग हैं और प्रधानता के कारण राज शब्द से युक्त हैं । यूं तो अनेक शास्त्रों में तीर्थराज की महिमा का बखान है, एक पौराणिक कथा के अनुसार, शेषनाग जी से ऋषियों ने पूछा कि प्रयागराज को तीर्थराज क्यों कहा जाता हैं ? शेषनाग जी ने उत्तर दिया कि एक समय सभी तीर्थों की श्रेष्ठता की तुलना की गई। भारत के समस्त तीर्थों को एक तुला के पलड़े पर रखा गया और दूसरे पलड़े पर केवल प्रयागराज को ! परिणाम स्वरूप, प्रयागराज का पलड़ा भारी रहा। दूसरी बार सप्त पुरियों को तुला पर रखा गया, फिर भी प्रयागराज का पलड़ा झुका रहा । इस प्रकार प्रयागराज की सर्वोच्चकता प्रमाणित हुई।

आस्था और श्रद्धा भाव का केंद्र हैं प्रयागराज का कुंभ मेला ।
भारतीय आस्था , तप और पुण्य का अनमोल केंद्र है । यहां पुण्य सलिला मकर वाहिनी गंगा, कूर्म वाहिनी यमुना और हंसा रूढ़ सरस्वती का पावन संगम है, जिसके दर्शन मात्र से जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश हो जाता हैं ।
कुंभ की पौराणिकता: आज़ के संदर्भ में ।
पौराणिक कथाओं के अनुसार परमपिता ब्रह्माजी ने सृष्टि रचना के लिए इस भूमि पर यज्ञ किया था। प्रयागराज की भूमि अनेक ऋषि-मुनियों, साधु-संतों, संन्यासियों, तपस्वियों, मनीषियों की उपदेश प्राप्त कर शंकर ने अपनी दिग्विजय यात्रा आरम्भ की थी और आचार्य मंडन मिश्र को पराजित तपस्थली रही हैं । आदि शंकराचार्य की दिग्विजय यात्रा का केन्द्र बिन्दु प्रयागराज ही रहा है। कुमारिल भट्ट से उपदेश प्राप्त कर शंकर ने अपनी दिग्विजय यात्रा प्रारम्भ की थी और आचार्य मंड़न मिश्र को पराजित किया था।
कुंभ अनेकानेकता में एकता का संदेश देती हैं ।
प्रयागराज के संगम क्षेत्र में ऐसी दिव्य ऊर्जा तथा शक्ति हैं, जो समाज के प्रत्येक वर्ग को अपनी ओर आकर्षित करती हैं । समूचे देश को अनेकता में एकता का संदेश देती हैं । महाकुम्भ का विराट पर्व विभिन्न देशों की संस्कृतियों को एक करने का कार्य करता हैं क्योंकि पूरे विश्व से विद्वान यहां आकर एक माह पर्यन्त अपने ज्ञान-विज्ञान की चर्चा एक-दूसरे में साझा करते हैं ।
गागर में सागर हैं सर्व सिद्ध प्रद: प्रयागराज कुंभ क्षेत्र ।
प्रयागराज एक नगर मात्र नहीं, बल्कि भारतीय आध्यत्मिक-सांस्कृतिक चेतना का स्पंदन हैं और महाकुम्भ महापर्व इस हेतु को गागर में सागर की तरह जन-जन में प्राण का संचार करता है । स्कंद पुराण, अग्नि पुराण, शिव पुराण, ब्रह्म पुराण, वामन पुराण और महाभारत सहित अनेक ग्रंथों में प्रयागराज की महिमा का उल्लेख हैं ।
जगदीश पटेल सीजी लाईव न्यूज़ तथा सहयोगी संपादकीय लेखक शशिभूषण सोनी के सुपुत्र आलोक सोनी रात्रि तक प्रयागराज पहुंचे और दिनांक 24 जनवरी , 2025 सुबह त्रिवेणी संगम में डुबकी लगा रहे हैं ।
भारतवर्ष के चार स्थानों में कुंभ का हर बारह वर्ष में आयोजन होता हैं । इनमें हरिद्वार, उज्जैन , नासिक और प्रयागराज ! इस वर्ष प्रयागराज में आयोजित कुंभ मेला को महाकुंभ का नाम दिया गया हैं । गंगा, यमुना और विलुप्त सरस्वती के संगम तट पर लगने वाले मेले में स्नान का अधिक महत्व हैं । मेरे भाइयों-बहनों मैं अपने पांच मित्रों शुभम पाण्डेय, अतुल पांडेय, आकाश राजपूत, आलोक कुमार तथा विक्की के साथ अपनी कार से दिनांक 23 जनवरी देर रात तक प्रयागराज पहुंच गया और शुक्रवार सुबह-सुबह मेला भ्रमण के बाद कुंभ स्नान कर रहे हैं। पांचों नवजवान प्रयागराज में दो-तीन दिन रुककर साधु-संतों और धार्मिक गुरुओं के दर्शन होंगे , आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होगा साथ ही पवित्र संगम तट स्नानादि करुंगा । उक्ताशय के उद्गार जगदीश पटेल सीजी लाईव न्यूज़ के संपादक तथा संपादकीय लेखक शशिभूषण सोनी के 28 वर्षीय सुपुत्र तथा सिविल इंजीनियर आलोक कुमार सोनी ने व्यक्त किया । उन्होंने बताया कि प्रयागराज कुंभ का अपना धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और पौराणिक महत्व हैं । पौराणिक ग्रंथों में वर्णित हैं कि यदि कोई व्यक्ति संगम की मिट्टी का भी अपने शरीर पर स्पर्श कर लेता हैं तो उसे समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती हैं तथा संगम तट के त्रिवेणी में पवित्र जल से स्नान करने से स्वर्ग के पुण्य का भागीदार बन जाता हैंक्ष। कुंभ मेला हमें एक-दूसरे से जोड़ने और आस्था तथा विश्वास को प्रदर्शित करता हैं । लगभग चार सौं साल के बाद ग्रह और नक्षत्र के विशेष संयोग से कुंभ पड़ने के कारण हम मित्रों ने वहां पर जाकर दर्शन-पूजन और संगम तट पर स्नानादि का कार्यक्रम बनाया हैं फ़िर विन्ध्वासिनी , बनारस अयोध्या जाने का निश्चय किया हैं । बहुत दिनों से मन में प्रयागराज कुंभ जाने की इच्छा थी प्रभु शंकर जी ने विनती सुन ली और आज हम इस क्षेत्र में पहुंच गए हैं । कुंभ का आशय ही हैं कलश ! कलश के श्रीमुख में भगवान विष्णु ,कंठ में रुद्र मूल में ब्रम्हा, मध्य भाग में देवी-देवताओं का वास होता हैं । ईश्वरीय कृपा से कुंभ क्षेत्र में यात्रा करते हुए आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ हैं । मानव शरीर भी एक कुंभ यात्रा हैं । धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष से ही मनुष्य को अमृत की प्राप्ति होती हैं । इसी अम्रत्व की प्राप्ति और स्नान करने के लिए यहां आएं हुए हैं। मेला क्षेत्र का नज़ारा अद्भुत हैं। बिना किसी जात पात और वर्ग भेद के लोग स्नान-दान और पूजा-पाठ कर रहे हैं । गंगा मैय्या सबकी मनोकामना पूर्ण करना । आप भी कुंभ मेला में स्नान दान और पूजा-पाठ करने अवश्य आवे



