14 साल से वही पुरानी दरें, स्कूलों पर आर्थिक बोझ
प्राइवेट स्कूल संचालकों का मुख्य विरोध 2011-12 से अटकी हुई फीस प्रतिपूर्ति को लेकर है। वर्तमान में सरकार कक्षा 1 से 5 तक के लिए प्रति छात्र ₹7,000 और कक्षा 6 से 8 तक के लिए ₹11,400 सालाना देती है। एसोसिएशन का तर्क है कि इस एक दशक से अधिक समय में महंगाई और संचालन लागत (Staff salary, Infrastructure) कई गुना बढ़ गई है। संचालकों ने मांग की है कि प्राथमिक स्तर की राशि को बढ़ाकर ₹18,000 और माध्यमिक स्तर के लिए ₹22,000 किया जाए। आप महसूस कर सकते हैं कि यह केवल एक विरोध नहीं, बल्कि स्कूलों के अस्तित्व की लड़ाई बन गई है।
काली पट्टी से लेकर तालाबंदी तक का सफर
विरोध की रूपरेखा काफी समय से तैयार की जा रही थी। शुक्रवार को प्रदेशभर के शिक्षकों और संचालकों ने स्कूलों में काली पट्टी बांधकर सांकेतिक प्रदर्शन किया था। लेकिन सरकार की ओर से कोई सकारात्मक पहल न होने पर आज स्कूलों के गेट पर ताले लटक रहे हैं। अभिभावकों को पहले ही सूचित कर दिया गया था, लेकिन इस बंद ने आने वाले सत्र के लिए एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि यदि मांगें नहीं मानी गईं, तो वे हाल ही में लॉटरी के जरिए चयनित हुए 14,403 नए छात्रों को प्रवेश देने से साफ इनकार कर देंगे।
“हम बच्चों की शिक्षा के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन ₹7000 में एक बच्चे को साल भर पढ़ाना आज के दौर में मुमकिन नहीं है। सरकार खुद मानती है कि सरकारी स्कूलों में प्रति बच्चा खर्च इससे कहीं ज्यादा है, तो फिर निजी स्कूलों के साथ यह भेदभाव क्यों? हमारी मांग सिर्फ पारदर्शिता और न्याय की है।”
इस हड़ताल का सीधा असर राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर पड़ता दिख रहा है। 20 अप्रैल से स्कूलों में ग्रीष्मकालीन अवकाश (Summer Vacation) शुरू होने वाले हैं, उससे ठीक पहले इस हड़ताल ने सरकार पर रणनीतिक दबाव बना दिया है। यदि सरकार और एसोसिएशन के बीच जल्द सुलह नहीं होती, तो जून में शुरू होने वाले नए शैक्षणिक सत्र में RTE एडमिशन की प्रक्रिया पूरी तरह ठप हो सकती है। फिलहाल, रायपुर से लेकर बस्तर और सरगुजा तक निजी स्कूलों के संचालकों ने एकजुटता दिखाई है। अब सबकी नज़रें मुख्यमंत्री सचिवालय पर टिकी हैं कि क्या वे इस वित्तीय गतिरोध को खत्म करने के लिए कोई नया प्रस्ताव देते हैं या नहीं।


