कोरबा। कोरबा जिले में रेत का अवैध खनन और परिवहन को लेकर मामला तूल पकड़ता जा रहा है। शहर क्षेत्र से लेकर उप नगरीय और ग्रामीण व दूरस्थ अंचलों में जहां भंडारण पर सवाल उठाये जाते रहे हैं और अवैध भंडारण को जुर्माना वसूलकर वैध बनाने का खेल चल रहा है वहीं बरसात में प्रतिबंध के बावजूद नदियों में जबरन ट्रेक्टर, जेसीबी उतार कर रेत निकाली जा रही है। जिन्हें इस कार्य का लायसेंस मिला है, उनके विरुद्ध प्रायोजित माहौल तैयार कर विरोध की बातें सामने आ रही हंै और जो अवैध काम कर रहे हैं, वे बे-रोक-टोक जबरजस्ती रेत खोद कर बेच रहे हैं। बालको के चुइया में यह हो चुका है।बता दें कि अक्षय गर्ग के भाई अभय गर्ग के नाम पर रेत के भण्डारण का लायसेंस खनिज विभाग द्वारा जारी किया गया है लेकिन अभय गर्ग प्रायोजित विरोध की राजनीति का शिकार होता आया है। अभय गर्ग ने बताया कि दो दिन पूर्व रात के वक्त जब उसकी पोकलेन मशीन भंडारण स्थल पर खड़ी थी तब चालक को दबाव डालकर स्थानीय कुछ ग्रामीणों के द्वारा नदी के बीच ले जाया गया और अवैध खनन का हल्ला मचाते हुए प्रायोजित तरीके से इसकी जप्ती बनवाई गई। इसकी जानकारी होने पर अभय गर्ग दौड़ा-भागा बांगो थाना पहुंचा और लिखित शिकायत दर्ज कराया कि उसकी मशीन को गांव के कुछ लोगों के द्वारा ऑपरेटर से मारपीट कर धमकी देकर जबरन नदी में ले जाया गया है और किसी भी तरह की हानि हो सकती है। शिकायत की उसे पावती नहीं दी गई और कोई कार्रवाई आज तक इस मामले में नहीं हुई है।
0 अवैध रेत बनी प्रशासन के आंखों की किरकिरी
जिले में अवैध रेत खनन और परिवहन के लगातार सामने आते मामले प्रशासन के आंखों की किरकिरी बनते जा रहे हैं। 10 जून से 15 अक्टूबर तक पर्यावरणीय कारणों से रेत के खनन पर प्रतिबंध लगाया गया है। प्रतिबंध से पूर्व लायसेंसी भंडारण स्थल पर भंडारित की गई रेत को ही बेचा जा सकता है। इसके विपरीत जिले के नदियों से बेखौफ रेत दिन-रात खोदी और बेची जा रही है। भंडारण का लायसेंस कुछ लोगों को ही प्राप्त है, लेकिन जिस पैमाने पर सुबह से लेकर रात तक बिना रुके रेत का परिवहन हो रहा है, भंडारण की रेत तो अब खाली हो जानी चाहिए थी। इन दिनों शहर से लगा सीतामणी-भिलाईखुर्द, कुदुरमाल, बरबसपुर, सर्वमंगला से लगा इलाका बरमपुर, राताखार-गेरवाघाट काफी सुर्खियों में है जहां रेत माफिया प्रशासन को ही आंख दिखाकर अपना काम कर रहे हैं। रेत चोरी में लगे लोग यह दावा करते नहीं थकते कि हम तो पुलिस से लेकर प्रशासन और खनिज अधिकारियों तक पैसा पहुंचा रहे हैं, फिर हमारा काम कैसे रुकेगा? अब इनके दावे में कितनी सच्चाई है, यह तो देने और लेने वाला ही जानता है।
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