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    CG High Court : वृद्ध मां के हक में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बेटे-बहू को घर खाली करने का आदेश बरकरार

    News EditorBy News EditorJuly 4, 2026No Comments3 Mins Read
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    CG High Court : बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बुजुर्ग माता-पिता के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई बेटा या बहू अपने बुजुर्ग माता-पिता को मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता है, तो उन्हें घर से बेदखल किया जा सकता है। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने एक प्रताड़ित बुजुर्ग मां के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बेटे और बहू की याचिका खारिज कर दी तथा मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल द्वारा पारित बेदखली के आदेश को सही ठहराया।

    बुजुर्ग मां की शिकायत पर शुरू हुई थी कार्रवाई

    मामले के अनुसार, बुजुर्ग महिला ने आरोप लगाया था कि उसका बेटा और बहू उसके साथ लगातार दुर्व्यवहार कर रहे थे। मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के कारण उसका जीवन मुश्किल हो गया था। इससे परेशान होकर महिला ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए गठित मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया।

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    शिकायत की सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल ने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर बेटे और बहू को घर से बेदखल करने का आदेश दिया था। बाद में अपीलीय ट्रिब्यूनल ने भी इस आदेश को बरकरार रखा।

    हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनलों के फैसले को माना सही

    ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती देते हुए बेटे और बहू ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानपूर्वक और सुरक्षित जीवन जीने का अधिकार है। यदि उनके अपने ही बच्चे उनके साथ प्रताड़ना, दुर्व्यवहार या उत्पीड़न करते हैं, तो कानून ऐसे मामलों में उन्हें संरक्षण देने की व्यवस्था करता है।

    अदालत ने माना कि ट्रिब्यूनलों द्वारा उपलब्ध तथ्यों के आधार पर दिया गया फैसला पूरी तरह उचित और कानून के अनुरूप है। इसलिए उसमें हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता।

    वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को मिला कानूनी संरक्षण

    हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम का उद्देश्य बुजुर्गों को सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना है। यदि परिवार के सदस्य ही उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं, तो संबंधित ट्रिब्यूनल उन्हें राहत देने और आवश्यकता पड़ने पर दोषी परिजनों को संपत्ति या घर से बेदखल करने का आदेश दे सकता है।

    अदालत ने कहा कि बुजुर्गों के अधिकारों की रक्षा करना कानून और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।

    ऐसे मामलों में बनेगी मिसाल

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में आने वाले ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित होगा। इससे उन बुजुर्गों को कानूनी भरोसा मिलेगा, जो अपने ही परिवार के सदस्यों की प्रताड़ना का सामना कर रहे हैं।

    यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है और कानून ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाने के लिए तैयार है।

    हाईकोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर यह स्थापित किया है कि बुजुर्ग माता-पिता को सुरक्षित, सम्मानजनक और भयमुक्त जीवन जीने का पूरा अधिकार है। यदि उनके साथ अन्याय होता है, तो वे कानून की शरण लेकर न्याय प्राप्त कर सकते हैं। अदालत का यह निर्णय न केवल वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को मजबूत करता है, बल्कि परिवारों को भी यह संदेश देता है कि बुजुर्गों की देखभाल और सम्मान उनकी नैतिक ही नहीं, बल्कि कानूनी जिम्मेदारी भी है।

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