कागजों में काला सोना, जमीन पर सिर्फ गड्ढे
कुसमुंडा खदान के आधिकारिक उत्पादन और प्रेषण (Dispatch) रिकॉर्ड में भारी विसंगतियां पाई गई हैं। सूत्रों के अनुसार, जितना कोयला खदान से निकाला जाना दिखाया गया, वह भौतिक रूप से स्टॉकयार्ड में मौजूद नहीं है। 70 लाख टन की यह भारी कमी किसी तकनीकी त्रुटि का परिणाम नहीं बल्कि एक सुनियोजित साजिश की ओर इशारा करती है। जानकारों का कहना है कि कागजों पर स्टॉक को बढ़ा-चढ़ाकर इसलिए दिखाया गया ताकि उत्पादन लक्ष्य (Production Target) को पूरा किया जा सके और उच्च अधिकारियों की कार्रवाई से बचा जा सके।
अधिकारियों की मिलीभगत और ‘फैंटम कोल’ का खेल
इस कथित घोटाले में कोलफील्ड्स के कई तकनीकी और वाणिज्यिक अधिकारियों की भूमिका जांच के दायरे में है। “फैंटम कोल” का मतलब उस कोयले से है जो केवल रजिस्टर में दर्ज है, लेकिन वास्तव में उसकी बिक्री या उपयोग कभी हुआ ही नहीं। यदि इस कोयले की कीमत वर्तमान बाजार दर से आंकी जाए, तो यह राशि 2100 करोड़ रुपये से अधिक बैठती है। यह केंद्र सरकार के कोयला मंत्रालय के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है क्योंकि कुसमुंडा देश की सबसे बड़ी खदानों में से एक है।
“स्टॉक में विसंगति के आरोप गंभीर हैं। हमने आंतरिक ऑडिट के आदेश दिए हैं। यदि दस्तावेजों में हेरफेर पाया गया, तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।”
— जनसंपर्क अधिकारी, SECL (आधिकारिक पक्ष प्रतीक्षित)
इस घोटाले का सीधा असर स्थानीय अर्थव्यवस्था और बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है। कोरबा के दर्री और कुसमुंडा क्षेत्रों के निवासियों में इस खबर के बाद चर्चा गर्म है। केंद्र सरकार की सतर्कता विभाग (Vigilance) और सीबीआई (CBI) द्वारा इस मामले की उच्च स्तरीय जांच शुरू होने की संभावना है। आने वाले दिनों में खदान के स्टॉक का फिजिकल वेरिफिकेशन (भौतिक सत्यापन) किया जाएगा। इसके चलते कोयले की लोडिंग और परिवहन प्रक्रिया कुछ समय के लिए प्रभावित हो सकती है। खदान क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ा दी गई है और फाइलों की आवाजाही पर नजर रखी जा रही है।


