Monsoon Crisis 2026 : नई दिल्ली। भारत में इस साल कड़ाके की गर्मी और कम बारिश के पूर्वानुमानों के बीच एक बेहद डरावनी खबर सामने आ रही है। प्रशांत महासागर में तेजी से बढ़ रहे तापमान के कारण ‘सुपर अल नीनो’ सक्रिय होने जा रहा है। अमेरिकी मौसम के अनुसार, यह खतरनाक मौसमी बदलाव मई से जुलाई के बीच ही दस्तक दे सकता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इसके इस साल सर्दियों (फरवरी 2027) तक एक्टिव रहने की आशंका है, जिससे भारत का दक्षिण-पश्चिम मानसून बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।
क्या होता है ‘सुपर अल नीनो’ और क्यों बढ़ी है चिंता?
सरल शब्दों में कहें तो ‘अल नीनो’ प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के असामान्य रूप से गर्म होने की प्रक्रिया है। जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ जाता है, तो वैज्ञानिक इसे ‘सुपर अल नीनो’ कहते हैं।
अमेरिकी एजेंसी के अनुसार, मई-जुलाई 2026 के बीच अल नीनो के उभरने की संभावना 82% है, जो दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 तक बढ़कर 96% तक पहुंच जाएगी। यानी यह संकट इस साल के अंत और अगले साल की शुरुआत तक खिंच सकता है।
भारतीय मानसून पर पड़ेगा सीधा असर: IMD ने दी चेतावनी
भारत अपनी सालाना बारिश का लगभग 70% हिस्सा जून से सितंबर के बीच होने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून से प्राप्त करता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब अल नीनो मजबूत हुआ है, भारत को सूखे और कमजोर मानसून का सामना करना पड़ा है।
देश के इन राज्यों पर मंडरा रहा है सूखे का सबसे बड़ा खतरा
सुपर अल नीनो का असर पूरे देश पर एक जैसा नहीं होगा। देश के कृषि क्षेत्रों को इसकी सबसे भारी मार झेलनी पड़ सकती है:
| क्षेत्र/राज्य | संभावित प्रभाव (Impact) |
| उत्तर-पश्चिम भारत (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान) | अगस्त-सितंबर में भारी कमी, हीटवेव (भीषण गर्मी) और सूखे जैसी स्थिति। |
| मध्य भारत (मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के हिस्से, गुजरात) | खरीफ फसलों के लिए पानी की भारी किल्लत। |
| दक्षिण प्रायद्वीप (तमिलनाडु और तटीय आंध्र प्रदेश) | हालांकि, अल नीनो के कारण सर्दियों के ‘उत्तर-पूर्वी मानसून’ में यहां भारी और विनाशकारी बारिश (बाढ़) का खतरा बढ़ जाता है। |
60% किसानों और अर्थव्यवस्था पर आफत!
भारत में आज भी लगभग 60% खेती पूरी तरह से मानसून की बारिश पर निर्भर है। यदि अगस्त-सितंबर में सूखा पड़ता है, तो:
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धान, मक्का, और सोयाबीन जैसी खरीफ फसलों की बुवाई और पैदावार बुरी तरह प्रभावित होगी।
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जलाशयों (डैम) में पानी का स्तर गिरेगा, जिससे आने वाले समय में पीने के पानी और बिजली उत्पादन का संकट गहरा सकता है।
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फसलों को नुकसान होने से देश में खाद्य मुद्रास्फीति यानी महंगाई तेजी से बढ़ सकती है।


