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आंदोलन के बाद बदला रुख, अब बच्चों को मिलेगा मौका
छत्तीसगढ़ प्रायवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन ने इससे पहले 1 मार्च से असहयोग आंदोलन शुरू किया था। स्कूल संचालकों का आरोप था कि सरकार उनकी समस्याओं को लगातार नजरअंदाज कर रही है। इसी नाराजगी के चलते 4 अप्रैल को प्रेस क्लब में हुई प्रेस वार्ता में निजी स्कूलों ने RTE के तहत प्रवेश नहीं देने का फैसला सुनाया था।
इस फैसले ने हजारों गरीब परिवारों की चिंता बढ़ा दी थी। कई माता-पिता रोज स्कूलों और शिक्षा विभाग के चक्कर लगा रहे थे। कुछ अभिभावकों को डर था कि उनके बच्चों का पूरा शैक्षणिक सत्र खराब हो सकता है। अब तस्वीर बदल गई है। एसोसिएशन ने संवेदनशील रुख अपनाते हुए गरीब और जरूरतमंद बच्चों के भविष्य को देखते हुए प्रवेश प्रक्रिया फिर से शुरू करने का निर्णय लिया है। यह फैसला सामने आते ही कई परिवारों ने राहत की सांस ली।
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स्कूलों के बाहर बढ़ी हलचल, अभिभावकों की लंबी कतारें संभव
रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग और जगदलपुर समेत कई शहरों में रविवार शाम से ही RTE Admission 2026-27 को लेकर चर्चा तेज हो गई। कई अभिभावक जरूरी दस्तावेज तैयार करते नजर आए। स्कूलों के बाहर सोमवार सुबह से भीड़ बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। एक अभिभावक ने कहा, “पिछले कुछ हफ्तों से घर में तनाव जैसा माहौल था। बच्चे बार-बार पूछ रहे थे कि स्कूल कब मिलेगा। अब उम्मीद लौट आई है।” गर्मी के बावजूद कई परिवार दस्तावेजों की फाइल लेकर शिक्षा विभाग के दफ्तरों तक पहुंचे। कुछ जगहों पर साइबर कैफे में आवेदन प्रिंट कराने वालों की भी भीड़ दिखाई दी। माहौल ऐसा था जैसे लोगों को लंबे इंतजार के बाद कोई बड़ी राहत मिली हो।
क्या हैं स्कूल संचालकों की मुख्य मांगें?
निजी स्कूल संचालकों का कहना है कि RTE के तहत फीस प्रतिपूर्ति और लंबित भुगतान का मुद्दा लंबे समय से अटका हुआ है। स्कूल प्रबंधन लगातार सरकार से स्पष्ट नीति और समय पर भुगतान की मांग कर रहे हैं। जानकारों का मानना है कि हालिया फैसले के पीछे सरकार और एसोसिएशन के बीच संवाद भी अहम वजह हो सकता है। शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, RTE सिर्फ कानूनी व्यवस्था नहीं बल्कि सामाजिक संतुलन का भी हिस्सा है। इससे आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को बेहतर शिक्षा का अवसर मिलता है।


